लोहड़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति, कृषि परंपरा और सामूहिक उल्लास का जीवंत उत्सव है। विशेष रूप से उत्तर भारत, खासकर पंजाब और हरियाणा में मनाया जाने वाला यह पर्व नई फसल के स्वागत, सूर्य के उत्तरायण होने और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का प्रतीक है। यह त्योहार यह संदेश देता है कि मानव जीवन प्रकृति के साथ सामंजस्य से ही सुखी और समृद्ध बन सकता है।
लोहड़ी की संध्या पर प्रज्ज्वलित अग्नि केवल अलाव नहीं होती, बल्कि वह आशा, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक होती है। लोग इसके चारों ओर एकत्र होकर तिल, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली और पॉपकॉर्न अर्पित करते हैं। ये परंपराएं केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि किसान संस्कृति और श्रम के सम्मान का भाव भी प्रकट करती हैं। यह वह समय होता है जब किसान अपनी मेहनत के फल के लिए प्रकृति और ईश्वर का आभार व्यक्त करता है।
लोहड़ी हमें यह भी सिखाती है कि जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का नाम नहीं, बल्कि सामूहिक खुशियों और सामाजिक जुड़ाव से ही जीवन पूर्ण होता है। लोक गीतों, भांगड़ा-गिद्धा जैसे नृत्यों और आपसी मिलन के माध्यम से यह पर्व समाज में प्रेम, भाईचारे और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। नई संतानों, नए विवाह और नए आरंभों का स्वागत लोहड़ी को और भी विशेष बना देता है।
आज के समय में जब समाज तनाव, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता के दबाव से गुजर रहा है, लोहड़ी जैसे लोक पर्व हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का अवसर देते हैं। ये त्योहार हमें सादगी, प्रकृति से जुड़ाव और साझा उल्लास का महत्व समझाते हैं। वास्तव में, लोहड़ी केवल आग के चारों ओर घूमने का पर्व नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने और संस्कृति को जीवंत रखने का उत्सव है। यही इसकी सबसे बड़ी सार्थकता और समृद्धि है।
एड. सौरभ शर्मा
संपादक / चेयरमैन
राष्ट्र जगत दैनिक अखबार
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