राष्ट्र जगत संवाददाता: रामविलास गौतम
लद्दाख, जम्मू-कश्मीर
हजारों फीट की ऊँचाई पर, बर्फ से ढकी शांत वादियों में आज एक नई कहानी जन्म ले रही है। ये वही लद्दाख की धरती है, जिसने दशकों तक सीमाओं की रक्षा में लगे वीर जवानों के संघर्ष और बलिदान को देखा है। लेकिन इन पहाड़ों की खामोशी में एक और सच भी छिपा था—जंग लगे लोहे के अवशेष, जो बीते सैन्य अभियानों की मूक गवाही देते थे। अब भारतीय सेना ने इन निशानों को मिटाकर प्रकृति को उसका पुराना सौंदर्य लौटाने का संकल्प लिया है।
1962 के बाद लंबे समय तक सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क संपर्क का अभाव रहा। इन दुर्गम और अत्यंत ऊँचाई वाले इलाकों में तैनात सैनिकों तक राशन, मिट्टी का तेल और अन्य जरूरी सामग्री केवल हवाई आपूर्ति से पहुँचाई जाती थी। सेना सेवा कोर (ASC) और वायु सेना द्वारा लोहे के जेरिकैनों में सामग्री भेजी जाती थी, जो वर्षों तक पहाड़ों, बर्फीली ढलानों और ग्लेशियरों में बिखरे रह गए।
समय बीतने के साथ जब सड़क संपर्क बेहतर हुआ, तब इन जंग लगे हजारों जेरिकैनों और धातु कबाड़ का वास्तविक प्रभाव सामने आया—जो लद्दाख के नाजुक पर्यावरण पर गहरे घाव छोड़ रहे थे।
इस गंभीर मुद्दे को सामने लाने में कर्नल पी. एस. बिंद्रा (सेवानिवृत्त), मोहम्मद राज खान और श्री स्टेंजिन दोरजे (वीरू) की महत्वपूर्ण भूमिका रही। ग्लेशियर क्षेत्र में वर्ष 1944 का जेरिकैन मिलना इस समस्या की ऐतिहासिक गहराई को उजागर करता है।
कर्नल बिंद्रा, जिन्होंने तीन दशकों से अधिक समय तक सेना में सेवा दी, ने वर्ष 2004 में MSTC के माध्यम से ई-ऑक्शन द्वारा अनुपयोगी सैन्य सामग्री के वैज्ञानिक निस्तारण की शुरुआत की थी। इस पहल ने अपेक्षित मूल्य से चार गुना अधिक राजस्व अर्जित कर देशभर में एक मिसाल कायम की।
इस बार भी मामले की गंभीरता को समझते हुए उत्तरी कमान मुख्यालय ने तुरंत ठोस कदम उठाए। उल्लेखनीय है कि ऑपरेशन सिंदूर जैसे महत्वपूर्ण सैन्य दायित्वों के बीच भी पर्यावरण संरक्षण को समान प्राथमिकता दी गई।
अब एक अनोखे रिवर्स लॉजिस्टिक्स अभियान के तहत अग्रिम चौकियों से लौटने वाले ASC वाहन दशकों पुराने जेरिकैन और धातु कबाड़ को वापस ला रहे हैं। कठिन मौसम, बर्फीले तूफान और दुर्गम भूभाग के बीच यह कार्य अपने आप में असाधारण है।
इकट्ठा किए गए इस कबाड़ को MSTC लिमिटेड के माध्यम से पारदर्शी ई-नीलामी के लिए तैयार किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ राष्ट्रीय राजस्व में भी वृद्धि होगी।
आज लद्दाख की वादियाँ धीरे-धीरे अपने पुराने घावों से उबर रही हैं। जहाँ कभी जंग लगे अवशेष बिखरे थे, वहाँ अब फिर से स्वच्छता और प्राकृतिक सौंदर्य लौट रहा है।
यह केवल सफाई अभियान नहीं, बल्कि एक संवेदनशील सोच का प्रतीक है—जहाँ देश की रक्षा करने वाली सेना अब धरती के घाव भी भर रही है। जब सीमा का प्रहरी खुद प्रकृति का रक्षक बन जाए, तो यह सिर्फ एक पहल नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति का सबसे सुंदर और जीवंत उदाहरण बन जाता है।
